सोमवार, 9 जनवरी 2012

उत्तराधिकारी


                        
नज़रों के सामने से ओंकारा का वो दृश्य घूमता है, जब अजय देवगन(ओमी) सैफ अली खान
(लंगड़ा त्यागी) की जगह विवेक ओबेरॉय(केसू फिरंगी) को अपना उत्तराधिकारी (बाहुबली)
घोषित कर देता है....सारी नाराज़गी और रंज़िश वहीं से शुरू होती है.....आखिर क्या वजह है
कि बहुत से माइलस्टोन को अपना उत्तराधिकारी नहीं मिल पाता तो कई जबरदस्ती वो चोगा
डालने को उतावले होते हैं....हश्र चाहे फिर चीर का चिथरा हो जाना ही हो...
जग को जीतने वाली जगजीतमयी आवाज़,आनंदमयी देवआनंद या फिर भोलेपन से दिल पर
राज करने वाले राजकपूर...क्या ऐसा नहीं लगता कि ये वो जूते छोड़ गए जिसके नाप के पांव
सदियों में बनते हैं....ये हस्तियां एक युग का निर्माण कर गए...जिसे अपनाने वाले बहुतेरे
आएंगे मगर कोई ऐसा जो उस व्यक्तित्व को जिन्दा कर दे....बहुत मुश्किल है... और अगर
कोई आ गया तो वो हकीकत में उत्तराधिकारी को परिभाषित और पुष्ट करेगा...
सच कहूं तो आज के दौर में होड़ लगी है कि अपने पूर्वज की रोपी फसल काटो और योग्यता
के नाम पर चाहे आपके पास ठेंगा हो..चिल्ला चिल्ला कर खुद को उत्तराधिकारी साबित करो..
खुले तौर पर कुछ नाम लूंगा...अभिषेक बच्चन, विवेक ओबेरॉय,तुषार कपूर,....एक लम्बी
फेहरिस्त....अखिलेश यादव,तोजस्वी यादव,राहुल गांधी.... इन्होंने बस पेशा अपना कर समझ
लिया कि हो गए ये असनी उत्तराधिकारी....हालांकि ऊपर के सभी श्रीमान् अपने पिता के
योग्यता वाले दूरबीन से खुद को देखें तो दूर तक नजर नहीं आएंगे...फिर ये उतावले हो कर
आते क्यों हैं और शोर क्यों करते हैं...
खैर उत्तराधिकारी की बात चल रही है तो कुछ नाम आदर्श स्थिति में नजर आते हैं, जिन्होंने
वाकई उन्हें अपना उत्तराधिकारी बनाया/बताया या घोषित किया जिनकी प्रतिभा के वो खुद भी
कायल हैं....रतन टाटा को खुद से ज्यादा चमकदार भविष्य सायरस मिस्त्री का दिखा तो उन्हें
अपना उत्तराधिकारी घोषित करने में उन्होंने कोई हिचक नहीं की... ऐसा ही कुछ मैराडोना
और मैसी का रिश्ता है...मैराडोना को यकीन था कि मैराडोना का बोझ उठाते हुए खुद को भी
स्थापित करना जैसा दुरूह काम मैसी ही कर सकते हैं इसलिए मैराडोना भी सीना ठोक कर उसे अपना
उत्तराधिकारी बताते हैं....
खैर ऐसी ही नई युगों का सफर चलता रहेगा जो  असली उत्तराधिकारी को ढ़ूंढ़ेंगे...और यात्रा भी चलती
रहेगी....  

गुरुवार, 5 जनवरी 2012

मुद्दों का महत्व


                          
परिवर्तन संसार का नियम है- ये गीता का सार है और अटल सत्य भी. समय के साथ हमारी
समस्या बदल जाती है और राजनीति के मुद्दे भी.लेकिन जहां तक मेरा मानना है हमारी ऐसी
बहुत सी समस्याएं होती हैं जिन्हें हम तो भुला ही देते हैं और वो कभी मुद्दा भी नहीं बन
पातीं.
राजनीति में मुद्दों का बड़ा महत्व है,लेकिन हमारे मुद्दे हम ही नहीं तय कर पाते हैं. राजनीति
में मुद्दों के चयन का आधार बस इतना होता है कि किसी का विरोध करना या किसी मुद्दे में
कमी ढ़ूंढ़ना.राजनीति तैरती भी मुद्दों पर है और चप्पू भी मुद्दे ही होते हैं. खैर, बात ये है कि
क्या वैसी समस्याओं के प्रति हमारा कोई उत्तरदायित्व नहीं बनता जो मुद्दे नहीं बन पाते?
मसलन, दोस्तों फेसबुक पर भारत बहुत चमक रहा है लेकिन निजी तोर पर मैं ऐसे हजारों लाखों बच्चों
को जानता हूं जिन्होंने या तो बुक, उनके लिए किताब, नहीं देखी या फिर शिक्षा योजना के खानापूर्ति
के ईंधन हैं.
देश में साक्षरता का पैमाना है कि आपको अपना हस्ताक्षर करना आता हो तो आप साक्षर हैं. फिर भी हम
बस आधी आबादी को साक्षर कर पाएं हैं.. क्या हमारी ये समस्या मुद्दा नहीं बन सकती.. नेताओं तथा
राजनीति के झूठे वादों को दिमाग से निकाल दें तो क्या जनता इतनी जागरुक नहीं हो सकती कि वो ऐसी
समस्याओं के प्रति रुचि ले? देश हर साल लाखों करोड़ों लोगों को इलाज के अभाव में खो देता है. क्या ये
बस उसी घर की समस्या है जिसने किसी अपने को खोया?
देश बस नेताओं द्वारा प्रायोजित मुद्दों पर बहस कर के खुद को जागरुक और अप टू डेट समझने जैसी भूल
कब तक करता रहेगा.....मेरे संवेदनशील एंव जागरुक मित्रों से भी ये अपील है कि कागजी कार्यक्रम के
दिखावे से अलग अपनी नैतिक जिम्मेदारी समझ कर ऐसी समस्या के लिए कुछ जरर करें....
वैसे, मुद्दों का रंगारंग कार्यक्रम चलता रहेगा.... हम समस्या पर बात करना चाहते हैं...उम्मीद है समस्या
के समाधान की दिशा में ये यात्रा चलती रहेगी...

रविवार, 1 जनवरी 2012

गणितीय हिसाब


             
ज़िंदगी हिसाब किताब से भरी है. हर पल कुछ जोड़ना,घटाना,गुणा और भाग करना पड़ता है.
सबसे पहले मैंने सेकेंड को जोड़कर मिनट, मिनट से घंटा,फिर दिन फिर सप्ताह,महीने और
इसी तरह साल तक का सफर तय किया.इस के देखा तो पाया मैं हर पल अनुभव जोड़ रहा
था.यहां जो बात कर रहा हूं वो भी अपने तुच्छ अनुभव का छोटा सा नमूना है. मेरा उद्देश्य
बस इतना है कि आप का ध्यान उन आंकड़ों की तरफ भी ले जाऊं.....जहां जाना जरूरी है.
 आंकड़ों का सबसे तगड़ा खेल लोकसभा चुनावों के बाद देखने को मिलता है.सबसे पहले तो
बहुमतबनाने के लिए जोड़तोड़ करना पड़ता है उसके बाद पाँचसाल लक्ष्य होता है....और इस बीच जो
एक चीज सबसे ज्यादा की जाती है-घोषणाएं. हां,यहां कोई हिसाब किताब नहीं होता.बात राजनीतिक
गलियारे की चल रही है तो लगे हाथ कुछ विभूतियों को शुक्रिया भी कह दूं जिनकी बदौलत ऐसे आंकड़ों को देखा पढ़ा और सुना जिसके लिए मुंह से बस बाप रे निकलता है...(हांलांकि इनके निजी जीवन
या राजनीतिक कैरियर से मुझे कुछ लेना देना नहीं है).माननीय ए.राजा, कलमाड़ी जी और श्री मधु कोड़ा
का सहृदय धन्यवाद....जिनकी बदौलत ये जाना कि एक लाख छिहत्तर हजार करोड़, और चार हजार करोड़
 जैसे आंकड़े भी होते हैं..
खुश है जमाना आज पहली तारीख है, मीठा है खाना आज पहली तारीख है.. यहां भी तारीख में आंकड़ों
का बदलाव है. खुश होने की चाहे जो वजह हो दुनिया के पास....मुझे फिक्र उनकी है जिनके लिए पहली
या आखरी तारीख का एक सा ही महत्व है...उन्हे हर दिन उसी एक रोटी के लिए जद्दोजहद करना पड़ता
है...मीठा तो शायद ख्वाब में भी नहीं मिलता...
आंकड़ों की उठापटक देखनी हो तो भला शेयर बाजार के सूचकांक(सेंसेक्स) से अच्छी जगह और क्या हो
सकती है...बचपन से दो ही चीज सुनना नसीब हुआ..पहला सूचकांक रिकार्ड ऊंचाई पर...सोना चांदी मजबूत
हांलांकि कुछ दिनों सालों से महंगाई उस गधे की तरह भाग रही है जिसकी दुम में किसी ने पटाखा लगा
दिया हो..एक और आंकड़ा जो चर्चा में है वो है रुपए का डॉलर के मुकाबले मूल्य...जो पारे की तरह ऊपर
नीचे जा रहा है...एक और आंकड़ा है जो लोगों का ध्यान खींच रहा है....तापमान...ये आंकड़ा भी शून्य से
कुछ कदम आगे और पीछे का खेल खेल रहा है....
खैर मेरे लिए तो सबसे खुशी की बात है कि मैंने अपने ब्लॉग के आंकड़े को शून्य से एक किया..... ये
यात्रा है आपकी दुआओं से चलती रहे........