परिवर्तन संसार का नियम है- ये गीता का सार है और अटल सत्य भी. समय के साथ हमारी
समस्या बदल जाती है और राजनीति के मुद्दे भी.लेकिन जहां तक मेरा मानना है हमारी ऐसी
बहुत सी समस्याएं होती हैं जिन्हें हम तो भुला ही देते हैं और वो कभी मुद्दा भी नहीं बन
पातीं.
राजनीति में मुद्दों का बड़ा महत्व है,लेकिन हमारे मुद्दे हम ही नहीं तय कर पाते हैं. राजनीति
में मुद्दों के चयन का आधार बस इतना होता है कि किसी का विरोध करना या किसी मुद्दे में
कमी ढ़ूंढ़ना.राजनीति तैरती भी मुद्दों पर है और चप्पू भी मुद्दे ही होते हैं. खैर, बात ये है कि
क्या वैसी समस्याओं के प्रति हमारा कोई उत्तरदायित्व नहीं बनता जो मुद्दे नहीं बन पाते?
मसलन, दोस्तों फेसबुक पर भारत बहुत चमक रहा है लेकिन निजी तोर पर मैं ऐसे हजारों लाखों बच्चों
को जानता हूं जिन्होंने या तो ‘बुक’, उनके लिए ‘किताब’, नहीं देखी या फिर ‘शिक्षा योजना’ के खानापूर्ति
के ईंधन हैं.
देश में साक्षरता का पैमाना है कि आपको अपना हस्ताक्षर करना आता हो तो आप साक्षर हैं. फिर भी हम
बस आधी आबादी को ‘साक्षर’ कर पाएं हैं.. क्या हमारी ये समस्या मुद्दा नहीं बन सकती.. नेताओं तथा
राजनीति के झूठे वादों को दिमाग से निकाल दें तो क्या जनता इतनी जागरुक नहीं हो सकती कि वो ऐसी
समस्याओं के प्रति रुचि ले? देश हर साल लाखों करोड़ों लोगों को इलाज के अभाव में खो देता है. क्या ये
बस उसी घर की समस्या है जिसने किसी अपने को खोया?
देश बस नेताओं द्वारा प्रायोजित मुद्दों पर बहस कर के खुद को जागरुक और अप टू डेट समझने जैसी भूल
कब तक करता रहेगा.....मेरे संवेदनशील एंव जागरुक मित्रों से भी ये अपील है कि कागजी कार्यक्रम के
दिखावे से अलग अपनी नैतिक जिम्मेदारी समझ कर ऐसी समस्या के लिए कुछ जरूर करें....
वैसे, मुद्दों का रंगारंग कार्यक्रम चलता रहेगा.... हम समस्या पर बात करना चाहते हैं...उम्मीद है समस्या
के समाधान की दिशा में ये ‘यात्रा’ चलती रहेगी...
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